Charlie Hebdo Cartoons से कुछ लोग आहत क्यों हो जाते हैं?

Charlie-Hebdo-Cartoon

Charlie Hebdo cartoons controversy

France में विगत 16 अक्टूबर को 18 साल के चेचेन्या मुस्लिम लड़के अब्दुल्ला अजारोव ने अपने टीचर सैमुअल पैटी Samuel Patty (47 years) का सिर सिर्फ इसलिए कलम कर दिया क्योंकि उन्होंने अपनी कक्षा के दौरान अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का पाठ पढ़ाते समय Charlie Hebdo पत्रिका में छपा पैगंबर मोहम्मद का Cartoons छात्रों के बीच दिखाया था। अन्य छात्रों को Charlie hebdo में छपे पैगंबर Muhammad Cartoons का दिखाया जाना उस चेचेन्या के मुस्लिम लड़के को ईशनिंदा (Blasphemy) लगा और उसने टीचर का गला रेत कर हत्या कर दी।

चेचेन्या रूस के कब्जे वाला अशांत एक इलाका है।
जहां इस्लामी आतंकी आए दिन रूसी फौज के साथ छापामार युद्ध लड़ते हैं।
इस क्षेत्र में शांति स्थापित करने के लिए भारी संख्या में रूसी जवान हमेशा तैनात रहते हैं।

Charlie Hebdo Cartoons और फ्रांसीसी घटनाचक्र?

इस्‍लामिक कट्टरपंथ की वजह से आज फिर से France में भय का माहौल है। इस घटना के बाद दो शहरों Montpellier और Toulouse में दिवंगत शिक्षक को श्रद्धांजलि देने के लिए कई होटलों की दीवारों पर Charlie Hebdo Muhammad Cartoons को प्रोजेक्‍टर पर दिखाया गया। मस्जिदों में लगे ताले, France समेत पूरे यूरोप में जगह-जगह इस्‍लामिक कट्टरवाद के खिलाफ प्रदर्शन शुरू हो गया है। यही नहीं इनकी सुरक्षा के लिए शहर में बड़े पैमाने पर हथियारबंद पुलिस को भी तैनात किया गया है।

धार्मिक आज़ादी को लेकर फिर छिड़ी बहस

France में एक बार फिर से धार्मिक आजादी को लेकर बहस छिड़ गई है। देश में लोगों का गुस्‍सा बढ़ता ही जा रहा है। France के ओस्सिटनेई इलाके की अध्‍यक्ष केरोल डेल्‍गा ने ट्विटर पर कार्टून को दिखाने की घोषणा कर दी। उन्‍होंने कहा कि शिक्षक सैमुअल पैटी को श्रद्धांजलि देने के लिए यह दिखाया जाएगा। France के होटलों पर ईसा मसीह और अन्‍य धर्मों के प्रमुख लोगों के कार्टून को भी दिखाया जा रहा है। केरोल डेल्‍गा ने कहा कि धर्मनिरपेक्षता, अभिव्‍यक्ति की आजादी और अंतरात्‍मा की आजादी के साथ कोई समझौता नहीं किया जाएगा। फ्रांसीसी सरकार ने ‘शहीद अध्यापक’ के लिए अपने सर्वोच्च सम्मान की घोषणा करी है।

जब काम की तलाश थी तब France जैसों ने दी थी शरण

अफ्रीका और एशिया के देश जब आजाद हुए थे, तब से हजारों मुस्लिम नागरिक काम की तलाश में यूरोप में आ बसे थे। यूरोपीय लोगों ने इन लोगों को इसलिए भी अपने यहां बसने दिया क्योंकि ये लोग मेहनत-मजदूरी के काम करते थे और सस्ते में उपलब्ध हो जाते हैं। फ्रांस में गैर-फ्रांसीसी मुसलमानों की संख्या 50 से 60 लाख तक है। ये कुल जनसंख्या के लगभग 9-10 प्रतिशत हैं। फ्रांसीसी सरकार ने इन पर काफी खोज-बीन करके आंकड़े जमा किए हैं। इन अफ्रीकी, तुर्की और मध्य एशियाई मूल के नागरिकों ने प्रायः फ्रांसीसी भाषा और संस्कृति से काफी ताल-मेल बैठा रखा है।

आतंक का बड़ा नेटवर्क खड़ा करने में जुटे हैं मुस्लिम युवा

France में 40-50 प्रतिशत मुसलमान ऐसे हैं, जो दिन में पांच बार नमाज पढ़ने, रोजा रखने, पर्दा करने और तालीम के लिए मदरसे जाने में विश्वास करते हैं। इस समय वहां 2300 मस्जिदें सक्रिय हैं और लगभग एक लाख फ्रांसीसियों को ईसाई से मुसलमान बनाया गया है। फ्रांसीसी सरकार को सबसे बड़ी चिंता इस बात की है कि वहां मुस्लिम्स युवाओं में से अब कई आतंकवादी होते जा रहे हैं। एक आंकड़े के मुताबिक 75 प्रतिशत युवा उग्रवाद में विश्वास करने लगे हैं। कुछ अरब देशों की मदद से ये युवक सारे यूरोप में आतंक का बड़ा नेटवर्क बिछा रहे हैं।

गले लगाने वाला ही आज गला कटवा रहा है!

अब विडम्बना देखिये कि सबसे ज्यादा मुस्लिम शरणार्थियों को गले लगाने वाला यूरोप आज खुद मुस्लिम कट्टरपंथियों की आंख का कचरा बना हुआ है। सीरिया, अफगानिस्तान, म्यांमार के रोहिंग्या और बांग्लादेश के शरणार्थियों को सबसे ज्यादा शरण फ्रांस, जर्मनी, इंग्लैंड और ऑस्ट्रेलिया ने ही दी है। सीरिया में गृह युद्ध के दौरान 1 लाख शरणार्थियों को अकेले जर्मनी ने शरण दिया था। France भी शरणार्थियों को अपनाने वाला दूसरा देश बन गया था। जबकि किसी भी पड़ोसी मुस्लिम मुल्क ने इसमें भागीदारी नही दिखाई।

ऑस्ट्रेलिया, इंग्लैंड, फ्रांस और जर्मनी में शरिया कानून की मांग को लेकर मुसलमानो ने कई बार वहां मोर्चा खोला हैं। इंग्लैंड और जर्मनी में तो आए दिन ये जुलूस निकलते रहते है। लंदन के कट्टरपंथी मुस्लिम शराब और पब की दूकानों को बंद करवाने के ख़िलाफ़ वहां कई बार प्रदर्शन कर चुके हैं। ऑस्ट्रेलिया में भी शरिया कानून की मांग हुई थी लेकिन सरकार द्वारा फटकारे जाने के बाद दोबारा इस पर कोई चर्चा नही हुई।

अभिव्यक्ति की आज़ादी गलत क्यों है?

जाने क्यों? फ्रांस का सेकुलरिज़्म मॉडल इन लोगो को नागवार गुज़रता है। अगर वहां खुल कर अभिव्यक्ति की आज़ादी हैं। तो इसमें गलत क्या है? यक़ीन मानिए फ्रांस बहुत प्यारा देश है, जिसने मुश्किल घड़ी में एक मानवतावादी दृष्टिकोण के चलते एक बड़ी मुस्लिम आबादी को अपने देश में शरण दी हो उसे किसी के सर्टिफिकेट की जरूरत नहीं होनी चाहिए। मुस्लिम कट्टरपंथी जो अपने धार्मिक खाँचो के बाहर नहीं निकलना चाहते। लेकिन दूसरों से Secularism की उम्मीद हमेशा करते हैं, सही मायनों में उन्होंने ही इस कौम को सबसे ज्यादा नुकसान पहुंचाया है। यही धार्मिक कट्टरपंथी विश्व मानवता के सबसे बड़े दुश्मन है।

Charlie hebdo muhammad cartoons पर पहले क्या हुआ?

आपको याद होगा कि इस से पहले 2015 में Charlie Hebdo के Muhammad Cartoons को लेकर France की प्रसिद्ध व्यंग्य-पत्रिका ‘चार्ली हेब्दो’ के 12 पत्रकारों की हत्या कर दी गई थी। थोड़ा और पीछे जाएँ तो पैगंबर मोहम्मद के कार्टूनों को लेकर 2005-06 में डेनमार्क के एक प्रसिद्ध अखबार के लिए इतना भयंकर अभियान चला कि इस्लामी देशों और यूरोप में लगभग ढाई सौ लोग मारे गए थे। प्रसिद्ध व्यंग्य-पत्रिका में Charlie Hebdo में Muhammad Cartoons के अलावा, ईसाई और यहूदी मजहबों के विरुद्ध भी कार्टून और लेख छपते रहते हैं। कभी ईसाई और यहूदियों ने इस पर कोई विवाद खड़ा नहीं किया।

यूरोपियन आजाद ख़्याल रहना पसंद करते हैं।

जहां तक यूरोप के आम लोगों की बात है तो मजहब के मामले में वे बिल्कुल आजाद रहना पसंद करते हैं। वे अपनी अभिव्यक्ति की आजादी को किसी भी मजहब से ज्यादा पवित्र मानते हैं। वे इस्लाम, कुरान और पैगंबर मोहम्मद की भी वैसी ही आलोचना करना अपना अधिकार समझते हैं, जैसे कि वे मरियम, ईसा मसीह या मूसा की करते हैं। वहां राष्ट्रपति जाक शिराक ने एक बार घोषणा की थी कि फ्रांस ‘लायसिती’ की नीति पर चलता है यानि कोई भी मजहबी कानून राष्ट्रीय कानून से ऊपर नहीं हो सकता है। फ्रांसीसी क्रांति से उपजे इस सिद्धांत पर 1905 में मुहर लगी थी, जब चर्च की दादागीरी के खिलाफ फ्रांसीसी संसद ने कमर कस ली थी।

जाक शिराक के जमाने में सरकारी स्कूलों में किसी छात्र या छात्रा को ईसाइयों का क्रॉस या यहूदियों का यामुका (टोपी) या मुसलमानों का हिजाब पहनकर आने की अनुमति नहीं थी। मजहबी छुट्टियों की मनाही थी। ईद और योम किप्पूर के दिन भी छुट्टियां नहीं होती थीं।

सोचिए यह किस तरह की इस्लामिक शिक्षा है?

जब भी इस तरह की कोई घटना होती है तो “मॉडरेट मुस्लिम” यही कहते हैं कि ये “कट्टरपंथियों” का काम है, यह तो इस्लाम के विरुद्ध है। इस्लाम को फॉलो करने वाले इन मॉडरेट लोगों ने अपनी किताबें पढ़ी हुई होती हैं, मगर ये सबसे यही कहते हैं कि इनका धर्म ये शिक्षा नहीं देता है। सदियों से ये यही बताते आ रहे हैं। दरअसल ये सच किसी को नहीं बताते कि असल में शिक्षा क्या देता है? और किस तरह की शिक्षा के तहत एक 18 साल के चेचेन्या लड़के अब्दुल्ला अजारोव ने इतिहास के शिक्षक पर हमला करने से पहले अल्लाहू-अकबर का नारा लगाया था?

पढ़िये Ka’b bin Ashraf की सच्ची घटना

क़ुरान के बाद सबसे ऑथेंटिक किताब हदीस की सहीह बुख़ारी के भाग पांच और हदीस नंबर 369 में मदीने के सबसे अमीर यहूदी कवि और नेता “काब बिन अल अशरफ़” की हत्या का ज़िक्र है।

बद्र की जंग के बाद जब मदीने के बहुत नामी गिरामी लोग मुहम्मद की सेना द्वारा मार डाले गए थे तो “काब” ने उस से आहत होकर ग़ज़ल और कविताएं लिखीं थी। उन कविताओं में मोहम्मद की आलोचना की जाती थी और उनका मज़ाक़ बनाया जाता था। जिसे सुनकर पैग़म्बर बहुत आहत हो गए थे। उन्होंने अपने लोगों से कहा कि “कौन काब को जान से मारेगा जिसने अल्लाह और उसके पैग़म्बर को आहत किया है?”

मसलमा, जो कि मोहम्मद के साथी थे, वो इस काम के लिए तैयार हुए। लेकिन वो थोड़े परेशान थे कि काब को धोखे और फ़रेब से मारना पड़ेगा। जिसके लिए पैग़म्बर ने उनसे कहा कि वो काब को धोखे और फ़रेब से मारने की वो इजाज़त देते हैं। फिर मसलमा अपने साथियों के साथ रात को काब के महल पर गए और उन्हें बाहर बुलाया। काब की पत्नी ने कहा कि उसे इतनी रात में डर लग रहा है। वो महल के बाहर न जाएं। मगर काब ने कहा कि मसलमा मेरा “दूध भाई” है और उस से डरने की कतई ज़रूरत नहीं है। काब को बाहर बुला कर मसलमा ने उस से कहा कि उसे कुछ पैसे उधार चाहिए। मसलमा को पैसे देने के लिए काब तैयार हो गया।

धोखे से मारा गया था काब!

इन्हीं बातों के दरम्यान मसलमा ने काब से कहा कि उसने जो इत्र लगा रखा है
वो बहुत ज़्यादा खुशबूदार है, तो क्या वह उसे पास से सूंघ सकता है। काब ने कहा कि सूँघो!
इत्र सूंघने के बहाने मसलमा ने काब की गर्दन दबोच ली
और अपने साथियों से कहा कि वो हमला कर दें!
मोहम्मद के साथियों ने काब के पेट को कुल्हाड़ी से फाड़ दिया।
इस तरह के दर्दनाक हमले से चीख़ते हुए काब की दर्दनाक मौत हो गयी।

इब्न इसहाक की “सीरत रसूलल्लाह” और भी कई लेखकों की किताबों में इस हत्या का बहुत विस्तार से वर्णन है।
इब्न साद ने अपनी किताब में लिखा है कि काब का कटा हुआ सिर
मसलमा ले कर मोहम्मद के पास गए जिसे देखकर पैग़म्बर बहुत ख़ुश हुए थे।

क्यों मारा गया था काब?

काब क़ाबिल आदमी था, कविताएं लिख सकता था जो उस दौर की हक़ीक़त बयान करती थीं।
अब कविताएं पैग़म्बर को आहत करती थीं तो उन्होने मसलमा जो कि
काब का दूध भाई था के जरिये काब की इतनी निर्दयता पूर्वक हत्या करवा दी।

आहत होने का ये सिलसिला पुराना है!

कवि, लेखकों, मूर्तिकारों, कलाकारों से आहत होने का सिलसिला इस्लाम में बहुत लंबा है।
यहां सदियों से यही सब चल रहा है। 2016 में पाकिस्तान के मशहूर क़व्वाल गुलाम साबरी के बेटे
अमजद साबरी को सिर्फ़ इसलिए गोली मार दी गयी थी
कि उन्होंने एक शादी के प्रोग्राम में एक क़व्वाली गाई थी जिसमें दूल्हे की तुलना
उन्होंने पैग़म्बर के दामाद “अली” से कर दी थी। बस इस तुलना से भाई लोग आहत हो गए
और अमजद साबरी को सरे आम गोली मार दी गयी।

आप समझ सकते हैं कि आहत होने पर जान से मारने की “शिक्षा” इस धर्म का मूल है।
और जो ये कहते हैं कि ये काम “कट्टरपंथियों” का है, उनसे पूछियेगा कि
Ka’b bin Ashraf” की हत्या के वक़्त कौन “कट्टरपंथी” था?
किसने आहत होने पर जान से मार डालने की परंपरा की नींव रखी थी??

कल और आज में क्या सीखा?

सदियों पहले की इस घटना और फ्रांस की इस घटना के बीच क्या बदला है?
कुछ नहीं…!! आप जहां पहले थे वहीं आज भी खड़े हैं।
मुसलमानों को ये सोचना चाहिए कि ये दुनिया अब काफी बदल चुकी है।
और इस्लाम को ऐसा छुई-मुई का पौधा मत बनाइये
कि किसी का फोटो छाप देने या उस पर व्यंग्य कस देने से वह मुरझा जाएगा?


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