Dharmik Yatra | आइये चलते हैं एक छोटी सी धार्मिक यात्रा पर

Dharmik-Yatra

आज ये Dharmik Yatra लिखते वक़्त, कहीं पढ़ी एक बात याद आती है…

एक बार किसी महापुरुष ने कहा था कि, अगर हमें किसी चीज को समझना है तो पहले उसके उद्देश्यों को समझना चाहिये क्योंकि यही मुख्य (Main) है… बाकी बातों को कहने के लिये उपमाओं, अलंकारों, प्रतीकों और रूपकों का जो सहारा लिया जाता है, वह कभी मुख्य नहीं होता लेकिन अगर आप उन्हें ही ‘सब कुछ’ मान लेंगे तो निश्चित ही उद्देश्य से भटक जायेंगे। और यह नियम सभी धर्म और धार्मिक किताबों पर लागू होता है।

इस Dharmik Yatra में यह समझें कि धर्म क्या है..? धर्म है आपके सत्कर्म। आपके वह अमाल जो मानव की भलाई के लिये हों और जो किसी भी कसौटी पर इंसानियत के खिलाफ जा रहा है, तो वह अधर्म है, Kufr है।

यह पूजा अर्चना, रोजे, नमाज यह पद्धतियां हैं न कि धर्म। यदि आप दिन-रात, पूजा-पाठ, रोजे-नमाज कर रहे हैं और बाकी दिनचर्या में एक भी ऐसा काम कर रहे हैं जो मानव हित से परे हो, या उससे आपका चारित्रिक दोष साबित होता हो तो आप धार्मिक नहीं हैं, बल्कि धार्मिक होने का नाटक कर रहे हैं। दूसरों को भी भ्रम दे रहे हैं और खुद भी भ्रम में हैं… और इसका दुखदायी पहलू यह है कि आज के दौर में शायद ही इस कसौटी पर कोई खरा उतरे।

अब आइये इस Dharmik Yatra में चंद बातें हो जाएँ धार्मिक किताबों पर, धार्मिक किताबें चाहे जिस धर्म से संबंधित हों… वे न सिर्फ सामाजिक व्यवस्था के संचालन को परिभाषित करती हैं अपितु श्रेष्ठ मानवीय आचार-व्यवहार को भी तय करती हैं। यहां लिखे जाने के वक्त की और आज की परिस्थितियों के अनुसार भेद हो सकता है लेकिन वह अलग विषय है।

मसलन कुरान का बदला लेने जैसे आदेश या मनुस्मृति की वर्ण व्यवस्था। कुरान के आदेश उस वक्त के हालात के हिसाब से थे, उसी तरह मनुस्मृति की वर्ण व्यवस्था कर्म आधारित लिखी गयी थी लेकिन श्रेष्ठ कुल के लोगों ने जब उसे जन्म आधारित मान लिया तो अब उस व्यवस्था को डिफेंड करने का कोई मतलब ही नहीं जो एक बड़े नागरिक समूह को शोषण के दलदल में धकेल देती हो।

सभी धर्मों के उत्थान काल में ढेरों कहानियाँ लिखी गयीं जिनमें ज्यादातर रूपक कथायें भर थीं जिनके पात्र और कथानक को ग्रहण करने के बजाय उनके सार को ग्रहण करना था लेकिन दुर्योग से हुआ वो नहीं।

लोगों ने सार न ग्रहण करके पात्र ग्रहण कर लिये, कहानियाँ ग्रहण कर लीं। इस काम में हिंदू समाज अग्रणी रहा… जिसके फलस्वरूप न सिर्फ ढेरों अजीबो गरीब भगवान अस्तित्व में आ गये, इंसान से ले कर पशु-पक्षी तक के अवतार में, अपितु ढेरों चमत्कारों भरी कहानियाँ भी वजूद में आ गयीं।

वह कहानियाँ जो तर्क की कसौटी पर कहीं से खरी नहीं उतरतीं, उल्टे नास्तिकों या उदार व्याख्या वाले बुद्धिजीवियों की हंसी का कारण बनती हैं। इसका एक साईड इफेक्ट यह भी हुआ कि चमत्कार के मोहपाश में बंधे बाकी धर्म भी अपने धर्म और महापुरुषों के साथ जबरन चमत्कार जोड़ने लगे।

सबसे लास्ट में वजूद पाये और बाकियों के मुकाबले सबसे व्यवहारिक धर्म इस्लाम भी इसके संक्रमण से न बच सका और सबसे लेटेस्ट भगवान साईं बाबा की अंतड़ियां भी धो कर पेड़ पर सुखाई जाने लगीं… यह हमारी मानसिक कमजोरी है कि हम चमत्कार को ही नमस्कार करते हैं।

तो मूल रूप से धर्म या धर्म पुस्तकों का मूल उद्देश्य कभी चमत्कार से लोगों को अभिभूत करने या वैज्ञानिक चुनौतियों को स्वीकार करना या वैज्ञानिक शोध पेश करना था ही नहीं। विज्ञान एक अलग चीज है।
धर्म जहां मानव जीवन को सुव्यवस्थित करने के लिये था
वहीं विज्ञान को मानव जीवन को सरल, सहज और सुरक्षित करने वाली विधा के रूप में रख सकते हैं।

लेकिन चूँकि विज्ञान ने धर्म से संबंधित अनुमान आधारित कई अवधारणाओं को ध्वस्त कर दिया तो धार्मिक लोगों ने इसे अपना सहज शत्रु समझ लिया और इसे धर्म के मुकाबले तुच्छ और हीन साबित करने के लिये उन किताबों से विज्ञान निकालने लगे, जिनका मकसद कभी विज्ञान था ही नहीं।

अब यह कोशिश दिन-रात धर्म की रक्षा में लगे लोगों को हास्यास्पद बना देती है।
जिसके जिम्मेदारी यह खुद को बहुत जहीन समझने वाले गैर जिम्मेदार लोग हैं, न कि धर्म या धर्म पुस्तकें।


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