Patni Ke Dil Mein Kaun Rahata Hai? पत्नी के दिल में कौन रहता है?

(सवाल)-Patni-Ke-Dil-Mein-Kaun-Rahata-Hai

क्या मुझे पता है कि मेरी Patni Ke Dil Mein Kaun Rahata Hai? शायद मैंने यह सवाल खुद से कभी किया ही नहीं। बस मैंने यह मान लिया कि उसके दिल में सिर्फ मैं रहता हूँ। क्योंकि अगर मैं उस पर शक करने लगा तो फिर उसके साथ क्षण भर भी जीना संभव ही नहीं, नामुमकिन है। इसलिए खुद से यह सवाल ही ना किया जाए।

ऐसे ही हम कभी भी ईश्वर के वजूद पर सवाल नहीं उठाते क्योंकि जिसके सहारे हमारा खानदान सैकड़ों सालों से जीते आये हैं। उसके ‘बिना’ जीना कैसे संभव हो सकता है? अतः इस पर कोई सवाल ना उठाया जाए तो बेहतर।

यही नज़रिया हमारा राम, कृष्ण, गुरु नानक, अंबेडकर आदि के बारे में है। लोग कभी इस बारे में कोई अध्ययन नहीं करते क्योंकि अगर सच्चाई सामने आ गयी तो फिर जियेंगे कैसे? इसी संदर्भ में यह कहा भी गया है कि अज्ञानता एक वरदान है।

यही वजह है लोग कभी अज्ञानता से बाहर नहीं आना चाहते। यहां तक कि जिसने जितनी ज्यादा डिग्रियां ले रखी हैं, जिसने जितने ज्यादा किताबें पढ़ रखी हैं वह उतना ही ज्यादा अंधकार में डूबा हुआ है।

Patni Ke Dil Mein Kaun Rahata Hai मुझे कैसे मालूम होगा?

अब मेरी Patni Ke Dil Mein Kaun Rahata Hai? मुझे नहीं मालूम, लेकिन मैंने ये विश्वास पाल लिया कि वह अब तन-मन से मेरी ही है। लेकिन मुझे इसके विपरीत भी थोड़ा सोच कर देख लेना चाहिए। क्या पता उसका पहला प्यार कोई और रहा हो? फिर किसी दूसरे से प्यार हुआ हो जो आंखों ही आंखों में खत्म हो गया हो। फिर कोई तीसरा भी रहा हो जिससे शायद वह कभी प्यार का इजहार ही न कर पाई हो।

एक सर्वे के अनुसार हर इंसान शादी से पहले छ: बार प्यार करता है। असली प्यार तो वही है जो पहले हुआ था। मेरे साथ जो हुआ, यह तो उसकी मजबूरी भी हो सकती है, एक औपचारिकता हो सकती है।

सुना है ज्यादातर शादियाँ तब होती है जब इंसान बहुत निराश हो जाता है। जब जिंदगी में करने के लिए कुछ नहीं होता तो वह सोचता है, चलो शादी ही कर लेते हैं। तो ऐसे में मुझे उसका कितना प्यार मिलेगा? आप इस बात को समझ सकते हैं। मैं तो सिर्फ ये कह रहा हूँ कि हमें कुछ पता नहीं कि हमारी पत्नी के मन में कौन रहता है?

मेरे एक दोस्त का दोस्त उसके घर में आता जाता था और धीरे धीरे उसकी पत्नी और उसके दोस्त के सम्बन्ध स्थापित हो गए। धीरे-धीरे उसे शक हुआ तो नौबत तलाक तक आ गयी। और जब बाद में बच्चों का Genetics टेस्ट हुआ तो वो भी उसके खुद नहीं थे, वो भी उसके दोस्त के निकले।

Genetics रिकॉर्ड रखने के लिए हुए एक सर्वे में क्या निकला?

एक बार किसी पश्चिमी देश की सरकार ने हर आदमी का Genetics record रखने के बारे पहल की थी। जब सारे लोगों का जेनेटिक सर्वे किया गया तो चौंकाने वाले तथ्य सामने आए। सर्वे में पाया गया कि वहां साठ प्रतिशत बच्चे अपने माँ-बाप की औलाद ही नहीं हैं। सरकार में बैठे लोग यह देखकर घबरा गए और वह रिपोर्ट हमेशा के लिए दबा दी गयी।

जब मुझे यह नहीं पता कि मेरी पत्नी के दिल में कौन रहता है,
जब मुझे यह नहीं पता कि मेरा बच्चा मेरा है या पड़ोसी का?
तो मुझे यह कैसे पता चल गया कि कोई ईश्वर या अल्लाह भी होते है,
और साथ यह भी कि यह धरती उनकी बनाई हुई है?

मतलब मुझे यह पता है कि धरती किसने बनाई लेकिन मेरे बच्चों को किसने बनाया यह आपको मुझे नहीं पता?
क्या पता वो मेरे किसी पड़ोसी के हो।

हमारे पैरों में कितना अंधकार है लेकिन हमारी निगाहें आकाश पर टिकी रहती है।
खाने को रोटी नहीं, रहने को छत नहीं लेकिन बात करेंगे अध्यात्म और अध्यात्मकिता की। 

लोग इतने धूर्त क्यों हैं?

बहुत धूर्त हैं हम, यहां जो जितना ज्यादा शिक्षित है वह उतना ही ज्यादा बड़ा धूर्त है।
हर व्यक्ति राम, कृष्ण, गुरु नानक, अंबेडकर में उलझा हुआ है ताकि इनके वजूद को बचाया जा सके।
खुद के घर में आग लगी है, लेकिन बाहर आग बुझाता फिर रहा है।

जब हम जिंदा लोगों के बारे में, जो हर वक्त हमारे साथ रहते है,
कुछ नहीं जान पाते तो हमें कैसे पता चलेगा कि राम, कृष्ण, गुरु नानक, अंबेडकर कैसे व्यक्ति थे?
वो तो सब एक इतिहास है और लिखने वाले ने उनका इतिहास अपने नज़रिये से लिखा है।

जैसे भगत सिंह हमारे लिए स्वतन्त्रता सेनानी है,
लेकिन अंग्रेजों के लिए वो एक आतंकवादी। मतलब यह कोई परम सत्य नहीं है।
यह सब अब कहानियाँ हैं। इस हिसाब से हम जितना जल्दी अतीत या इतिहास से आजाद हो जाएं,
उतना जल्दी हम अपने अंधेरे से बाहर आ पाएंगे। 

जो बीत गया, वह सच था या झूठ?

जो बीत गया, वह ना तो सच है और ना ही झूठ।
ना उसको आप गलत या सही साबित कर सकते।
सच सिर्फ वही है जो हो रहा है।
सच्चाई यह है कि हम वर्तमान में कोई भी फैसला लेकर मन चाहा भविष्य बना सकते हैं। 

ये जो गली-गली में जागरण हो रहे हैं, कीर्तन हो रहे हैं, प्रवचन हो रहे हैं,
तीर्थ यात्राएं हो रही है ये सब ऐसे ही है जैसे हम पानी में मथनी डालकर मथे जा रहे हों।
यानि इसमें से कुछ नहीं निकलना है। 

ऐसा हज़ारों साल से क्यों चल रहा है?

हमारी हजारों सालों की बेवकूफी के बाद भी हमें आज तक कुछ हासिल नहीं हुआ और ना ही आगे होगा।
आप ही बताओ, हजारों सालों के बाद भी आज कौन सी चीज सही हो रही है?
अगर हम खुद ईमानदारी से यह सवाल करेंगे, तब जाकर हमें सही जवाब मिल पाएगा।
लेकिन समस्या तो यही है कि सामान्य आदमी में इतनी हिम्मत नहीं कि वह इस तरह का सवाल उठा सके।

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