Peter Wohlleben | पेड़ गूंगे नहीं होते, पेड़ आपसे कुछ कहना चाहते हैं!

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Who proved that plants have life?

पेड़ गूंगे नहीं होते– “पेड़ आपसे कुछ कहना चाहते हैं!” – यह कपोल-कल्पना भर नहीं है! वास्तव में पेड़ों के पास सचमुच का एक संचार-तंत्र होता है, जिसके ज़रिए वे अपने संदेश प्रसारित करते हैं। वनस्पति विज्ञान के क्षेत्र में इधर के सालों में हुई सबसे अनूठी खोजों में ये स्थापनाएं अब शामिल हो चुकी हैं! दो साल पहले Peter Wohlleben की किताब ‘The hidden life of trees’ जर्मन से अंग्रेज़ी में अनूदित हुई थी।

Peter Wohlleben पर क्या आरोप लगाए गए?

तब उन पर ‘एंथ्रोपोमोर्फ़ाइज़िंग ऑफ़ ट्रीज़’ यानी ‘पेड़ों के मानुषीकरण’ का आरोप लगाया गया था। यह कहकर उनकी बातों को सिरे से रद्द कर दिया गया था कि पेड़ों को मनुष्यों की तरह देखना एक बुनियादी क़िस्म की भावुक मूर्खता है। पीटर की किताब में कही गई बातों को ‘Wishful Thinking’ यानी ‘ख़ामख़याली’ कहकर उनके विरुद्ध बाक़ायदा एक Online petition अभियान भी छेड़ा जा चुका है।

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बहरहाल, ‘The hidden life of trees’ में पीटर ने ‘World Wide Web’ की तर्ज़ पर ‘Wood wide web’ शब्द को ईजाद किया था। उन्होंने बताया था कि पेड़ गूंगे नहीं होते। ‘World Wide Web’ मनुष्यता के इतिहास की सबसे बड़ी संचार क्रांति का कूटपद है तो ‘Wood wide web’ इससे पीछे नहीं है। पीटर ने वृक्षों के निजी ‘Communication systems’ के बारे में इतने हैरतअंगेज़ खुलासे किए थे कि उन पर Europe में ख़ासी बहस छिड़ गई थी।

Peter Wohlleben की मूल स्थापना क्या है?

Peter Wohlleben की मूल स्थापना यह है कि वृक्षों में सामुदायिकता की भावना मनुष्यों की ही तरह बहुत प्रबल होती है। वृक्षों के भी अपने परिवार और समुदाय होते हैं। दिल्ली की वनसम्पदा पर प्रामाणिक और लोकप्रिय शोध करने वाले पर्यावरणविद् प्रदीप कृष्ण भी यही बात कहते हैं। वे शाल वृक्षों का उदाहरण देते हैं। उनका कहना है कि शाल वृक्षों की लकड़ियों का इस्तेमाल भारत में बहुत बड़े व्यावसायिक पैमाने पर होता है।

ये वृक्ष हिमालय की तराई से लेकर पश्चिमी उत्तर प्रदेश और बंगाल से लेकर ओडिशा और उत्तर-पूर्वी मध्यप्रदेश तक पाए जाते हैं। उन्नीसवीं सदी के उत्तरार्ध में जब भारत में ब्रिटिश राज द्वारा रेल की पटरियां बिछाई जा रही थीं, तब रेलवे स्लीपर्स बनाने के लिए बड़े पैमाने पर शाल की लकड़ियों की मांग निर्मित हुई थी।

तब भारतीय वन विभाग ने भरसक कोशिशें की कि शाल वृक्षों को उनके दायरे के बाहर भी विकसित किया जाए, लेकिन वे क़ामयाब नहीं हो सके। बहुत दिमाग़ खपाने के बाद भी वे इस बात को समझ नहीं पाए कि शाल वृक्ष अपनी उस रेंज के बाहर क्यों नहीं विकसित हो सकते हैं?

शाल वृक्ष के बारे में कितना जानते हैं?

वास्तव में शाल बहुत ही सामुदायिक क़िस्म के वृक्ष होते हैं। आपने कभी किसी बाग़ में किसी शाल वृक्ष को अकेला नहीं देखा होगा, जैसे कि दूसरे वृक्ष देखे जा सकते हैं। यह जानकारी भी भारतीय जनमानस को बहुत समय से है कि किसी एक शाल वृक्ष को अकेले विकसित करना असम्भव है। वे हमेशा एक छोटे-मोटे वन के रूप में ही विकसित होते हैं- शालवन। वे अपने सघन समुदाय के बाहर पनप नहीं सकते। और अगर किसी विकसित शाल वृक्ष को ले जाकर अन्यत्र रोप दिया जाए तो वह एकाकीपन का शिकार होकर ही मर जाता है।

1980 के दशक में जब देहरादून के निकट भारतीय वन्यजीवन संस्थान की स्थापना की गई थी तो उसके इर्द-गिर्द शालवन फैला हुआ था। संस्थान के लोगों ने पाया कि जो भी शाल वृक्ष अपने समुदाय से अलग हो जाता, वह धीरे-धीरे मर जाता। वह इसलिए मर जाता, क्योंकि अब वह अपने समुदाय से संवाद नहीं कर पा रहा था।

एक अन्य पर्यावरणविद Tim Flannery का भी कहना है कि पेड़ गूंगे नहीं होते। बचपन में हम सभी ने ऐसी कहानियां जरूर पढ़ी हैं, जिनमें वृक्षों की आंखें होती हैं, वे बोल सकते हैं, यहां तक कि चल भी सकते हैं। यह निश्चित ही Fantasy थी। लेकिन वृक्ष कभी भी इतने जड़वत नहीं थे, जितने कि हमने उन्हें मान लिया था। और अगर हम वृक्षों की जीवन-प्रणाली को समझ जाएं तो हमारे लिए हर जंगल एक अनूठे आश्चर्यलोक में तब्दील हो जाएगा।

लेकिन पेड़ आपस में कैसे बात करते हैं? ज़ाहिर है, वे मनुष्यों की तरह किसी भाषा का इस्तेमाल नहीं करते।
लेकिन उनके अपने तौर-तरीक़े होते हैं। मसलन, पेड़ों के पास गंध को अनुभव करने की क्षमता होती है।
विभिन्न गंध के माध्यम से ही वे बहुत कम्युनिकेशन कर लेते हैं!

Wood wide web क्या है?

पीटर वोहलबेन

हम सोच भी नहीं सकते कि पेड़ कितने सामुदायिक होते हैं। पेड़ काटे जाने के दु:ख को वे सभी मिलकर साझा करते हैं। अगर किसी जंगल में कोई पेड़ काट दिया जाए तो उसके आसपास के दरख़्त मिलकर उसके कटे हुए तने को पोषित करने का हरसम्भव प्रयास करते हैं। Peter Wohlleben ने जिसे ‘Wood wide web’ की संज्ञा दी है, वह वास्तव में पेड़ों का एक विशिष्ट संचार तंत्र है, जिसका माध्यम होते हैं मिट्‌टी में पाए जाने वाले पादप-कवक। ऊपर से सभी पेड़ चाहे जितने अलग दिखाई देते हों, धरती के भीतर जड़ों के माध्यम से और पादप-कवक के नेटवर्क के माध्यम से वे सभी एक-दूसरे के सम्पर्क में रहते हैं। अगर किसी
जंगल को खोद दिया जाए तो हम पाएंगे कि उसके भीतर इन जड़ों और कवकों का एक घना
संजाल बिछा हुआ है। इसी को ‘Wood wide web’ कहा गया है।

पीटर वोहलबेन का कहना है कि वन जैव-विविधता की प्रयोगशाला होते हैं।
एक अकेला वृक्ष अनेक मायनों में गूंगा और बहरा होता है।
वह कभी भी उतने लम्बे समय तक जीवित नहीं रह सकता,
जितने समय तक जंगल का एक पेड़ जी सकता है।

पीटर ट्री टॉयलेट पेपर्स के बारे में क्या बताते हैं?

Peter Wohlleben कमाल के आदमी हैं।
वे अपनी काठ की कुर्सी को ट्री-बोन्स यानी वृक्षों की अस्थि‍यों से निर्मित सामग्री कहते हैं।
Fireplace में लकड़ियां जलाए जाने को वे शवदाह की संज्ञा देते हैं।
वे कहते हैं कि वृक्ष वर्ष में एक बार शौचादि से निवृत्त होते हैं
और अगर आप जाड़ों के दिनों में किसी जंगल से गुज़र रहे हैं
तो इसका मतलब है कि आप ट्री-टॉयलेट-पेपर्स के एक ज़ख़ीरे पर चल रहे हैं।
और, बक़ौल पीटर, ईवन अ डेड ट्री ट्रन्क इज़ लाइक अ मदरशिप ऑफ़ बायोडायवर्सिटी
यानी किसी मृत वृक्ष का तना भी जैवविविधता का संवाहक होता है।
ग़रज़ ये कि पीटर ने वनस्पति-शास्त्र की समूची भाषा-संरचना बदल दी है।

[ सुशोभित का यह लेख “अहा! ज़िंदगी” पत्रिका के जून अंक में प्रकाशित हुआ था]

एक ताज़ा अध्ययन

पौधे हमारी सोच से कहीं ज्यादा स्मार्ट होते हैं।
वैज्ञानिकों के अनुसार वे सुन, देख और बात कर सकते हैं।
इसके अलावा पौधे चीजों का याद रखने, शिकार करने और दुश्मनों की पहचानने की क्षमता भी रखते हैं।
कुछ पौधे कीटों से बचने के लिए रसायन उत्सर्जित करते हैं
वहीं कीड़े खाने वाले पौधे अपने शिकार के कदमों की संख्या को ‘गिनती’ करते हैं,
वे सिर्फ उन कीटों को ही फंसाते हैं जो पौधे के संवेदकों को 20 सेकंड के भीतर दो बार छेड़ते हैं।

वैज्ञानिकों के अनुसार पौधे मधुमक्खियों की आवाज़ सुनकर परागकण छोड़ते हैं
और लता वाले पौधे तो देख भी सकते हैं। अपनी कोशिकाओं को थरथराते हुए पौधे एक ध्वनि को उत्सर्जित करते हैं
और फिर वापस आने वाली गूंज का पता लगाते हैं।
यह उन्हें नई दीवार और पेड़ों पर चढ़ने के अवसरों को खोजने में सक्षम बनाता है।
यूनिवर्सिटी ऑफ वेस्टर्न ऑस्ट्रेलिया की डॉक्टर मोनिका गागलियानो ने दिखाया है
कि कैसे मिर्ची के पौधे बेसिल के पौधों के पास जल्दी उग जाते हैं क्योंकि बेसिल कीड़ों से उसकी रक्षा करता है


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