कर्मकांडों में सेहत का तड़का

मेरा एक दोस्त मुझ से कहने लगा कि “हिंदूइस्म (सनातन) में जितने भी कर्मकांड हैं वो सब किसी न किसी अच्छी वजह से हैं… उदाहरण के लिए सुबह-सुबह सूर्य को जल चढ़ाने का कर्मकांड ही ले लीजिये… सुबह-सुबह सूर्य के सामने खड़े होने से सबसे ज़्यादा विटामिन डी मिलती है… इसी लिए धर्म में सूर्य को जल चढ़ाने का कर्मकांड जोड़ा गया।”
मैंने कहा कि “ऐसा बिल्कुल भी नहीं था और न है… ये विटामिन डी वाला फंडा धार्मिकों की चालाकी है… सूर्य को पानी देना शुद्ध रूप से पूजा था और है… जब ये पूजा शुरू हुई थी तब किसी को विटामिन डी का पता भी न था और वैसे भी सब लोग धूप में ही रहते थे दिन भर, खेतों में काम करते थे… फ़्लैट में कोई नहीं रहता था और उनमें विटामिन डी की कमी नहीं होती थी… ये सूर्य को ऊर्जा का स्रोत माना, जीवनदायी माना इसलिए उसकी पूजा शुरू कर दी गयी।”
दोस्त ने कहा “मगर इसमें हर्ज क्या है कि सुबह जल भी चढ़ा लिया जाय और विटामिन डी भी ले ली जाए।”
मैंने कहा “बिल्कुल हर्ज है इसमें… आप शुद्ध रूप से पूजा कीजिये उसमे कोई हर्ज नहीं है मगर आप अपने कर्मकांड की वजह को झूठ का आवरण ओढ़ाते हैं वो ग़लत है…!
दुनिया के सारे लोग सुबह की धूप को सेहत के लिए अच्छा मानते हैं मगर वो लोटा लेकर सूर्य के आगे नहीं जाते हैं… आपको धूप में जाना हो ऐसे ही जाइये सेहत बनाइये… और जब पूजा करनी हो तो लोटे में पानी के साथ जाईये… मगर ये ना कहिये कि लोटा लेकर विटामिन डी ले ली तो क्या हर्ज है… बिल्कुल उसमे हर्ज है क्योंकि पूजा को पूजा रखिये और चिकित्सा को चिकित्सा… नौजावान पीढ़ी को झूठ न सिखाईये… आपको क्यों शर्म आती है अपने बच्चे से ये कहते हुए कि “बेटा ये शुद्ध पूजा है, इसका विज्ञान से कोई लेना देना नहीं है… तुम्हारी श्रद्धा बनती हो तो करो… मेरी बनती है मैं करता हूँ।”
ऐसे ही एक साहब ने पहले मुझ से बहुत चहकते हुए कहा था कि “नमाज़ से अच्छी कोई कसरत नहीं है, सारे योग इसके आगे फ़ेल हैं… नमाज़ साइंटिफिक है।”
उनसे भी मैंने कहा था कि “नमाज़ में विज्ञान जैसा कुछ नहीं है, ये शुद्ध रूप से अल्लाह की पूजा/इबादत है… नमाज़ का निर्माण आपकी हेल्थ को ध्यान में रखकर नहीं किया गया था… इसका निर्माण शुद्ध रूप से अल्लाह को पूजने के लिए किया गया था… इसलिये इसका कोई वास्ता आपकी सेहत से नहीं था और न है… जो भी नमाज़ पड़ता है वो अपनी सेहत सही रखने के लिए नहीं पढ़ता है… वो शुद्ध रूप से अल्लाह को ख़ुश करने के लिए नमाज़ पढ़ता है।”
फिर वो साहब भी कहने लगे कि “इसमें हर्ज क्या है कि हेल्थ भी बन जाये और इबादत भी हो जाये।”
मैंने कहा “क्यों? ख़ाली इबादत के लिए नमाज़ पढ़ोगे तो उसमें रस नहीं आएगा आपको क्या? बोर हो गए हो क्या जो उसमे हेल्थ और योगा का तड़का लगाना ज़रूरी है? ये झूठ है कि नमाज़ को आप स्वास्थ्य से जोड़ें… नमाज़ ही बेस्ट कसरत होती तो इस्लामिक मुल्क़ में जिम न होते और न कोई बीमार पड़ता… मगर चूंकि आपको लगता है कि धर्म के लिए झूठ बोलना सही है इसलिये आपको ये झूठ बोलने कोई बुराई नहीं दिखती है।”
ऊंचे ओहदों पर बैठे धार्मिकों की रोज़ी रोटी उनका धर्म होता है इसलिए वो नए-नए फ्लेवर अपने धर्म के कर्म कांडों से जोड़कर आपको उल्लू बनाते रहते हैं… श्रद्धा हो आपकी तो आप जैसे चाहें वैसे इबादत करें और जैसे चाहें वैसे पूजा करें… मगर ख़ुद को और अपने बच्चों को धार्मिकों द्वारा गढ़े झूठ से बचाइए… ये झूठ आने वाली पीढ़ियों के लिए बड़े ख़तरनाक होंगे… क्योंकि धार्मिक इसी तरह के झूठ से विज्ञान का सहारा ले कर अज्ञान स्वरूप जन्मे कर्मकांडों को आप के पल्ले बांधते रहेंगे और आप योग और विटामिन डी के बहाने इनकी दुकाने चलाते रहेंगे।

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