Wahhabism | Radical Islam In Hindi

Wahhabism-Radical-Islam-In-Hindi

इस्लाम यूँ तो यहूदी (Semitic) की कोख से पैदा हुआ है, लेकिन अगर इसे आप इतिहास की नजर से देखेंगे तो जहां यह शुरुआती दौर में समाज सुधार का आंदोलन था, वहीं यह अपने संस्थापक मोहम्मद साहब के बाद एक शुद्ध राजनीतिक आंदोलन में बदल गया था, जहां सत्ता के लिये मुसलमानों के गुट आपस मे ही लड़ रहे थे। रशिदुन खिलाफत, उमय्यद, अब्बासी, फात्मी या ऑटोमन साम्राज्य ने जो भी लड़ाइयां लड़ीं और रियासतें जीतीं, उनका लक्ष्य सत्ता की प्राप्ति थी न महज़बी प्रचार प्रसार… लेकिन बावजूद इसके बड़े पैमाने पर धर्मांतरण हुए और पूरी की पूरी आबादी इस्लामिक ढांचे में ढल गयीं।

लेकिन इसमें एक बड़ी गहरी समझने लायक जो बात है वह यह कि हदीस और कुरान की रोशनी में गढ़ी गयी इस्लाम की परिभाषा एक सीमित भौगोलिक क्षेत्र के लिहाज़ से तो ठीक थी लेकिन वह अरब के बाहर की उन तमाम संस्कृतियों को खुद में समाहित करने के लिये बिलकुल तैयार नहीं थी जिन्होंने इस्लाम तो अपनाया लेकिन अपना वजूद भी बरकरार रखा। इस चीज को आप किसी और क्षेत्र से समझने के बजाय अपने ही देश को मॉडल के तौर पर रख कर बेहतर समझ सकते हैं।

भारत में लोग सामान्यतः हिंदू थे लेकिन जातियों में बंटे हुए थे और उनके बहुत से रीति-रिवाज परंपरायें बहुत पीछे से चली आ रही थीं। उन्होंने इस्लाम अपनाया जरूर लेकिन फिर भी उन रीति रिवाजों, परंपराओं को न छोड़ा और उन्हें भी इस्लाम में ही ढाल लिया। आप जाट, राजपूत मुस्लिम समाजों में बहुतेरी परंपरायें वैसी की वैसी पा सकते हैं, जिनका मूल इस्लाम से कोई नाता नहीं। जिनको गुरुओं की परंपरा में यकीन था, उन्होंने पीर बना लिये… जिन्हें मूर्तियाँ के आगे झुकने की आदत थी उन्होंने मजारों के आंचल में मंजिल तलाश ली।

ऐसा लगभग उन सभी देशों में हुआ था जिनकी अपनी सांस्कृतिक पहचान थी। उन्होंने अपनी सांस्कृतिक पहचान को, अपनी रीतियों परंपराओं को इस्लाम के साथ शामिल कर दिया था और इसे सूफी इस्लाम के रूप में एक अलग पहचान मिली थी। यह इंसान को इंसान से जोड़ने वाला वह सिलसिला था जिसका प्रभाव बहुत तेजी से तुर्की, अरब, ईरान से ले कर भारत तक हुआ.. इसके साथ जो कर्मकांड जुड़े वह उन्हीं दूसरी संस्कृतियों के घालमेल की वजह से थे, जहां लोगों ने अपनी पुश्तैनी परंपराओं को इस्लाम से जोड़ दिया था।

उस दौर में जो भी खून-खराबा मुसलमानों द्वारा हुआ, वह सत्ता की भूख का नतीजा था लेकिन उसका उस इस्लामिक कट्टरता से कोई लेना-देना नहीं था, जिसका विकृत स्वरूप अब चरमपंथ या आतंकवाद के रूप में हम देखते हैं। एक दौर वह भी था जब अरबी भाषा का बोलबाला था, बगदाद ज्ञान का केन्द्र कहा जाता था। ज्ञान पर जैसा वर्चस्व आज पश्चिम का है तब वैसा ही वर्चस्व अरब जगत का हुआ करता था।

दसवीं शताब्दी के वजीर इब्ने उब्वाद के पास एक लाख से अधिक किताबें थीं, तब इतनी किताबें पूरे यूरोप के सभी पुस्तकालयों को मिला कर भी नहीं थी। अकेले बगदाद में वैज्ञानिक ज्ञान के तीस बड़े शोध केन्द्र थे। बगदाद के अलावा सिकंदरिया, यरूशलम, अलेप्पो, दमिश्क, मोसुल, तुस और निशपुर अरब संसार में विद्या के प्रमुख केन्द्र हुआ करते थे और इस्लाम एक अलग ही रूप में अपनी मौजूदगी कायम किये था।

भारत में उस दौर में कुरान अरबी भाषा तक ही सीमित थी, जिसे अरबी सीख कर लोग सवाब के नजरिये से पढ़ लिया करते थे और हदीसों से आम इंसानों का बिलकुल भी कोई खास वास्ता नहीं था। बस मस्जिदों में कुछ खास किस्म की, अच्छाई पेश करने वाली हदीसें कभी जुमे, या शबे कद्र की रात को सुनाई जाती थीं और लोग बस वहीं तक सीमित रहते थे… या तब औरतों के बीच इज्तिमा और मिलाद जैसे इवेंट होते थे जहां कुछ अच्छी हदीसें ही दोहराई जाती थीं।

यानि तब यह शिर्क-बिदत जैसे मसले बहुत ही छोटे और लगभग नगण्य पैमाने पर थे और मुसलमानों की बहुसंख्य आबादी इससे अनजान अपने अंदाज में ही जी रही थी। अलग संस्कृतियों और परंपराओं के घाल-मेल से ही मुसलमानों में शिया, हनफ़ी, मलायिकी, साफ़ई, जाफ़रिया, बाक़रिया, बशरिया, खलफ़िया, हंबली, ज़ाहिरी, अशरी, मुन्तजिली, मुर्जिया, मतरुदी, इस्माइली, बोहरा, अहमदिया जैसी अनेकों आस्थाओं ने इस्लाम के दायरे में रहते अपनी अलग पहचान बना ली थी। शुद्धता का दावा करने वाले देवबंदी खुद उस विचारधारा की पहचान के साथ जीने के बावजूद इस सांस्कृतिक विविधता को स्वीकार कर के ही आगे बढ़ रहे थे।

इस शुद्ध अरबी इस्लाम की अवधारणा मोहम्मद इब्ने अब्दुल वहाब (1703-1792) ने रखी थी जिसने इस्लाम के अंदर विकसित होती खूबसूरत और प्रगतिशील परंपराओं को ध्वस्त करना शुरू किया। उन सभी कर्मकांडों, रीति रिवाजों, परंपराओं को पहली बार कुरान और हदीस की रोशनी में शिर्क और बिदत के रूप में पहचानना शुरू किया और इस इस्लाम को इतना संकीर्ण रूप दे दिया कि किसी तरह की आजादी, खुलापन, मेल-जोल की कोई गुंजाइश ही न रहे।

कुरान और हदीस के दायरे के बाहर जो भी है उसे खत्म कर देने का बीड़ा उठाये अब्दुल वहाब ने हर मुशरिक के कत्ल और उसकी सम्पत्ति की लूट को हलाल करार दिया और इसके लिये बाकायदा 600 लोगों की एक सेना तैयार की और जिहाद के नाम पर हर तरफ घोड़े दौड़ा दिये। तमाम तरह की इस्लामी आस्थाओं के लोगों को उसने मौत के घाट उतारना शुरू किया। सिर्फ और सिर्फ अपनी विचारधारा का प्रचार करता रहा और जिसने उसे मानने से इंकार किया उसे मौत मिली और उसकी सम्पत्ति लूटी गयी।

मशहूर इस्लामी विचारक ज़ैद इब्न अल-खत्ताब के मकबरे पर उसने निजी तौर पर हमला किया और खुद उसे गिराया। मज़ारों और सूफी सिलसिले पर हमले का एक नया अध्याय शुरू हुआ। इसी दौरान उसने मोहम्मद इब्ने सऊद के साथ समझौता किया। मोहम्मद इब्ने सऊद दिरिया का शासक था और धन और सेना दोनों उसके पास थे। दोनों ने मिलकर तलवारों के साथ-साथ आधुनिक असलहों का भी इस्तेमाल शुरू किया। इन दोनों के समझौते से दूर-दराज के इलाकों में पहुँचकर अपनी विचारधारा को थोपना और खुले आम अन्य आस्थाओं को तबाह करना आसान हो गया।

अन्य आस्थाओं से जुड़ी तमाम किताबों को जलाना मोहम्मद इब्न-अब्दल-वहाब का शौक सा बन गया। इसके साथ ही उसने एक और घिनौना हुक्म जारी किया और वह ये था कि जितनी सूफी मज़ारें, मकबरे या कब्रें हैं, उन्हें तोड़कर वहीँ मूत्रालय बनाये जाये। सउदी अरब जो कि घोषित रूप से वहाबी आस्था पर आधारित राष्ट्र है, उसने मोहम्मद इब्न-अब्दल-वहाब की परम्परा को जारी रखा और अपने यहां इन्हीं कारणों से नबी और उनके खानदान को समेटे कब्रिस्तान तक को समतल कर दिया, काबे के एक हिस्से अलमुकर्रमा को भी इसी कारण से गिरा दिया गया… आज जो जिहाद का विकृत रूप हम देखते हैं, वह इसी अवधारणा की कोख से पैदा हुआ है।

और सिर्फ जबरदस्ती के तौर पर ही नहीं था, बल्कि एक जन जागरण अभियान के तौर पर भी था जहां न सिर्फ मीनिंग सहित कुरान की आयतों और उन हदीसों का प्रचार-प्रसार बड़े पैमाने पर किया गया जिनसे शिर्क और बिदत के रूप में उन सब चीजों को इस्लाम से अलग किया जा सके जिनका मूल इस्लाम से सम्बंध नहीं। धीरे-धीरे इस विचारधारा ने उन सभी मुस्लिम मुल्कों को अपनी चपेट में लेना शुरू किया जो अपनी मिली-जुली संस्कृति के साथ खुशहाल जीवन जी रहे थे।

तुर्की में एर्दोगान के नेतृत्व में आया बदलाव आप देख सकते हैं। एक हिंदू बंगाली संस्कृति के साथ जीने वाले बांग्लादेश के बदलते रूप को आप तस्लीमा नसरीन के लेखों से समझ सकते हैं। पाकिस्तान में जिन्ना और इकबाल जो पाकिस्तान बनाने वाले और सम्मानजनक शख्सियत हुआ करती थीं, वह अपने अहमदिया, खोजा, पोर्क, वाईन वाले अतीत की वजह से नयी पीढ़ी के पाकिस्तानियों के ठीक उसी तरह निशाने पर हैं जिस तरह भारत में नव राष्ट्रवादियों के निशाने पर गांधी हैं… बाकी भारत में यह बदलाव देखना है तो अपने आस-पास देख लीजिये, पश्चिमी यूपी, हरियाणा, राजस्थान के जाट, राजपूत, मुस्लिम समाज को देख लीजिये।

वहाबियत पूरे इस्लाम के इतिहास, मान्यताओं, परस्पर सौहार्द और पहचानों के सह-अस्तित्व के साथ खिलवाड़ करती आई है… एक पहचान, एक तरह के लोग, एक जैसी सोच, एक किताब वाली नस्ली शुद्धता का पैमाना हिटलर ने वहाबिज्म से ही Adopt किया था। वहाबियत से बाहर के फिरकों को इस्लाम से खारिज करार दे के उनके कत्ल तक को हलाल बताने के साथ बाकी सभी धर्मों के लोगों को तो कुफ्र के इल्जाम में वाजिब-उल-कत्ल करार दे दिया गया, उनकी सम्पत्ति की लूट और उनकी औरतों का धर्मांतरण जायज करार दे दिया गया। पाकिस्तान, बांग्लादेश इनके मनपसंद खेल के मैदान बन गये।

यह एकरूपता का विचार समावेशी और विविधता भरे समाज के लिये किस तरह घातक है, इसे आप संघ के मॉडल से समझ सकते हैं जो अपने ‘हिंदुत्व के मॉडल’ को विविध संस्कृतियों से लैस पूरे भारत पर एक समान थोपना चाहते हैं… क्या नार्थ-ईस्ट के आदिवासी, जनजातीय समाज और दक्षिण के हिंदू समाज उस मॉडल के साथ सामंजस्य बिठा सकते हैं जिसमें ‘राम’ एक आदर्श और श्रेष्ठ भगवान हैं? क्या हिंदी पट्टी जैसा राम-मंदिर आंदोलन पूरे देश को उद्वेलित कर सकता है? क्या गाय पूरे भारत की माता हो सकती है? अगर नहीं तो क्या उन पर यह थोपना ठीक है? वहाबिज्म भी इसी रूपरेखा पर चल रहा है।

संघ के पास हिंदुओं की आबादी वाले एक-दो देश है लेकिन वहाबियों के पास ढेरों देश हैं और इस विचारधारा को प्रमोट करने वाले सऊदी जैसे वह देश हैं जिनके पास बेशुमार पैसा है और जाकिर नायक जैसे विद्वान उनके ब्रांड एम्बेसडर हैं। किसी नव राष्ट्रवादी भारतीय की गांधी के प्रति सोच और नव राष्ट्रवादी पाकिस्तानी की सोच एक ही है कि वे दोनों उनके ‘मॉडल’ से मेल नहीं खाते।

वहाबिज्म और संघ

इस्लाम की जो व्याख्या इब्ने तैमिया ने चौदहवीं शताब्दी में दी थी, अट्ठारहवीं शताब्दी में अब्दुल वहाब ने उसे एक व्यापक अभियान में बदल दिया और कुछ प्वाइंट्स पर असहमति के बावजूद भारतीय भू-भाग में मौलाना मौदूदी ने इसे अपने तरीके से आगे बढ़ाया जो जमाते इस्लामी के फाउंडर थे।

इस्लाम में मूल रूप से इमामों के पीछे बनने वाले हनफी, हंबली, शाफई, मलिकी के रूप में चार फिरके थे जिसके अंदर बहुत से अलग-अलग फिरके बने लेकिन पूरे भारत (आजादी से पहले का ब्रिटिश भारत) के सुन्नी, हनफी फिरके से ताल्लुक रखने वाले हैं जो उन्नीसवीं शताब्दी में अशरफ अली थानवी और अहमद रजा खां के पीछे देवबंदी और बरेलवी फिरके में बंट गये।

अरब के लोग खुद को हंबली फिरके में रखते हैं, जबकि मध्यपूर्व एशिया और अफ्रीका के लोग शाफई और मालिकी फिरके से वास्ता रखते हैं लेकिन यह सभी फिरके (शिया इनसे पूरे तौर पर अलग हैं) सुन्नी हैं और इनके बीच तीन विचारधारायें सल्फी, वहाबी और अहले हदीस प्रचलित है… कट्टरता के मामले में आप अहले हदीस, वहाबी और सल्फी को नीचे से ऊपर रख सकते हैं। सल्फी वहाबी तो एक तरह से अपने सिवा बाकी दूसरे सभी मुसलमानों को इस्लाम से ही खारिज कर देते हैं।

मौदूदी ने भारतीय भू-भाग में इसी विचारधारा को आगे बढ़ाया था और जो तेजी से फलती फूलती अब इस दौर में पहुंच चुकी है कि आप पढ़े-लिखे, आधुनिक युग के मुस्लिम (देवबंदी) युवाओं में इस परिवर्तन को टखने से ऊंचे होते पजामे, बढ़ती दाढ़ी के रूप में अपने आसपास देख सकते हैं। हां बरेलवी समाज इसके मुकाबले भले आपको खिलाफ़ दिखेंगे।

इस विचारधारा के दो चेहरे हैं… एक वह जिसने तरह-तरह के संगठन बना कर ‘जिहाद’ के नाम पर जंग छेड़ रखी है जो तब तक चलेगी जब तक पूरी दुनिया इनके रंग में न रंग जाये और दूसरा वह जो बड़े काबिल अंदाज में अपने तर्कों के सहारे उन सारी बातों को डिफेंड करता दिखता है, जिसके सहारे यह जिहादी ग्रुप पनप और पल रहे हैं।

यह खुद को बदल लेने की, अपनी बुराइयों-खामियों को डिफेंड करने की एक कला भर है… ठीक उस अंदाज में जैसे एक हिंदू राष्ट्र की अवधारणा को आदर्श मानने वाले संघ ने खुद को दिखावे के तौर पर एक ऐसे सांस्कृतिक संगठन के रूप में बदल लिया है जो उत्तर भारत में भगवान राम के मंदिर को मुद्दा बना कर भाजपा को सत्ता के शीर्ष पर पहुंचा देता है, वहीं दक्षिण में राम को गरियाने वाले पेरियार समर्थकों के साथ भी खड़ा हो सकने लायक कोई संगठन या दल बना लेता है, और उत्तर भारत के उपास्य देवी-देवताओं को अपशब्द कहने वाले लिंगायतों को साधने के लिये भी किसी न किसी रूप में ढल जाता है।

वह उत्तर भारत में गोवध के नाम पर इंसान की जान लेने वाली भीड़ भी खड़ी कर सकता है और नार्थ ईस्ट या दक्षिण में उसे खाने वाली भीड़ के साथ भी किसी न किसी रूप में खुद को ढाल लेता है। किसी भी विचारधारा के फैलाव के लिये उसमें फ्लेक्सिब्लिटी जरूरी है और यह बात वे भी जानते हैं इसलिये जो मूल विचार के साथ न एडजस्ट हो पा रहा हो, उसे एडजस्ट करने के लिये दूसरे अनुषांगिक संगठन और सेनायें बना ली जाती हैं, जो ऊपरी तौर पर भले अलग दिख रही हों लेकिन उनकी जड़ें एक होती हैं और वे विरोधी विचार को समाहित करने से ले कर ‘शूट’ या ‘ब्लास्ट’ कर देने तक का काम बख़ूबी कर लेती हैं।

जाहिरी तौर पर संघ से वहाबियत की तुलना आपको विचलित कर सकती है क्योंकि यह एक छोटे मॉडल की तुलना बड़े मॉडल से है लेकिन यह तुलना परफार्मेंस के लेवल पर नहीं, विचारधारा के लेवल पर है। अगर आप सूक्ष्मता से इसका आकलन करेंगे तो समझ में आ जायेगी, लेकिन उसके लिये आपको अपने पूर्वाग्रहों से बाहर आना पड़ेगा।

आप सीधे ‘वहाबिज्म इज इक्वल टू टेररिज्म’ के लेवल पर चले जाते हैं लेकिन वहाबिज्म एक विचारधारा है, और आतंकी इस विचारधारा के हो सकते हैं लेकिन वे खुद पूरी विचारधारा नहीं हैं। इसे सरल अंदाज में आप एक उदाहरण से समझ सकते हैं।

पूरी दुनिया में वहाबियत को सऊदी अरब प्रमोट करता है, उस अरब का क्राऊन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान है और जब वह भारत आता है तो आपके फायर ब्रांड हिंदुत्व का हीरो लपक के गलबहियां करता है, ठठ्ठे लगा कर हंसता है… कहीं एक पल के लिये भी यह ख्याल आया मन में कि हमारा हिंदू शेर भला कैसे आतंकवाद से गलबहियां कर रहा है?

जाहिर है इसे आपने इसके आउटर फेस के रूप में देखा होगा कि यह दो राष्ट्रों के मुखिया गलबहियां कर रहे हैं, साथ कहकहे लगा रहे हैं… जबकि इसका इनर फेस यह था कि एकरूपता की पैरोकार दो कट्टर विचारधारायें एक दूसरे से गलबहियां कर रही थीं, साथ कहकहे लगा रही थीं। यही समानता है।

विचारधारा के फैलाव के लिये यह आउटर-इनर फेस वाली थ्योरी जरूरी है। जब इस्लाम फैलाया गया तब उस आउटर फेस को सामने रखा गया जो हर समाहित होने वाली संस्कृति को फराखदिली से कबूल कर रहा था, यह अपग्रेडेशन की अवस्था थी और जब यह अपग्रेडेशन पूरा हो गया तो फिर सिस्टम को रीसेट कर के उसी चौदह सौ साल पुराने दौर में वापस ले जाने की मुहिम शुरू हो गयी।

संघ अभी इसी अपग्रेशन के शुरुआती दौर से गुजर रहा है, वह सन चौरासी में सिखों पे भी हाथ साफ कर लेता है और सन दो हजार दो में मुसलमानों पर भी, लेकिन उसने ‘राष्ट्रीय मुस्लिम मंच’ और ‘राष्ट्रीय सिख संगत’ जैसे विंग भी बना रखे हैं। वह मुस्लिम द्वेष की बिना पर दक्षिणपंथी विचारधारकों के हीरो बने मोदी, योगी को पीएम, सीएम भी बना देगा और आपको बहलायेगा भी कि मुस्लिम भी हमारे ही भाई हैं।

अभी आउटर फेस में वह फ्लेक्सिबल है लेकिन केन्द्र के साथ सभी राज्यों, सभी संवैधानिक, गैर संवैधानिक संस्थाओं में जब वह क़ाबिज़ हो जायेगा तब शायद दक्षिण में न राम का अपमान करने की आजादी होगी, न उत्तर भारत के देवी-देवताओं को नकारने की, न जनजातीय समूहों को अपने ईष्टों को प्राथमिकता देने की… आदिवासी, जनजातियां, लिंगायत, पेरियारी, अंबेडकरवादी (विधर्मियों के लिये व्यवस्था कुछ और भी हो सकती है) इनके खास निशाने पर होंगे और तब यह भी दो ऑप्शन देंगे कि या तो हमारे जैसे हो जाओ, या ‘गौरी लंकेश’ हो जाओ। विधर्मियों को भी शायद दो ऑप्शन दें या सदियों पुराना बदला उतारने के नाम पर इकलौते ऑप्शन तक सीमित कर दें… मौत।

दोनों विचारधाराओं में फ़र्क बस इतना है कि इस्लाम का अपग्रेडेशन पूरा हो चुका है और वह वहाबियत के रूप में रीसेट मोड में है जबकि संघ का अपग्रेडेशन अभी शुरू ही हुआ है।

आप वहाबियत से संघ की समानता की बात कीजिये, संघ के लिये सॉफ्ट कार्नर रखने वाला कोई भी हिंदू फौरन दस-बीस उदाहरणों सहित इसके खिलाफ तर्क रखेगा कि संघ एक सांस्कृतिक संगठन है और वह सभी मत-मान्यताओं को स्वीकारता है और आज़ादी देता है, किसी भी हिंसक कार्रवाई करने वाले व्यक्ति या गिरोह को वह फौरन संघ से खारिज कर देगा…

आप वहाबिज्म को आतंकवाद से जोड़िये, तत्काल वहाबिज्म के लिये सॉफ्ट कार्नर रखने वाला बंदा उन्हीं कुरानी, आयतों और हदीसों की उदार और इंसानियत को सर्वोपरि रखने वाली व्याख्या कर के बता देगा, जिनके सहारे इन आतंकी संगठनों की बुनियाद खड़ी होती है… और इन्हें वह भी फौरन इस्लाम से खारिज कर देगा।

यह दोनों एक ही धरातल पर जीने वाले जीव हैं, और जो इन विचारधाराओं के आउटर फेस के मोह में बंधे इसके इनर फेस से इसलिये इनकार करते हैं क्योंकि उसके लिये इनके मन में एक सॉफ्ट कार्नर मौजूद होता है। हालाँकि मुसलमानों से इतर इस दक्षिणपंथी विचारधारा में एक बड़ा वर्ग इस इनर फेस को खुल के स्वीकारने वाला भी है और इसे क्रिया की प्रतिक्रिया बता कर जस्टिफाई भी करता है।

लेकिन प्रतिक्रिया के शिकार असल में उस क्रिया के जिम्मेदार नहीं होते बल्कि वे कहीं न कहीं उस क्रिया की प्रतिक्रिया के जनक होते हैं। हालाँकि यह क्रिया और प्रतिक्रिया का खेल समाज को उस गहरी खायी में धकेल देता है जहां किसी का जीवन सुरक्षित नहीं रह जाता। कई इस्लामिक देश इसकी जिंदा मिसाल हैं और हमने इस सिलसिले में व्यापक समझ न दिखाई तो इस सिलसिले की अगली कड़ी हम होंगे।

वहाबिज्म और आतंकवाद

अब इस पर आइये कि कट्टरता को नये आयाम देनी वाली इस वैश्विक विचारधारा में मौजूदा दौर का आतंकवाद कैसे घुस गया। क्योंकि शुरुआती दौर के बाद एक बार फिर इसमें राजनीतिक हित और सत्ता का लोभ शामिल हो चुका है… आप ईस्ट अफ्रीका के अल-शबाब, पश्चिमी अफ्रीका के बोकोहरम या बांग्लादेश के जमाते इस्लामी को इससे अलग कोई पहचान नहीं दे सकते।

इससे इतर तालिबान, अलकायदा, सिपाह-ए-सहाबा, जमातुद्दावा, अल खिदमत फाउंडेशन, जैश-ए-मोहम्मद, लश्करे तैयबा, आईएस जैसे संगठन भी इसी विचारधारा के वाहक हैं जो लगातार खूनी खेल, खेल रहे हैं। इस चीज से इन्कार नहीं किया जा सकता कि इसकी पृष्ठभूमि में आपको वे पूंजीवादी ताकतें भी मिलेंगी जो अपने राजनीतिक या आर्थिक हितों की पूर्ति के लिये न सिर्फ हर उस संभावित संघर्ष को उभारती हैं, जिसमें एक पक्ष मुसलमानों का हो… दूसरे पैसा और हथियार भी मुहैया कराती हैं। अमेरिका और आले सऊद के गठजोड़ की जड़ यही चीज है कि यह रेडिकल इस्लामिक विचारधारा उनके बहुत से राजनीतिक आर्थिक हित साधती है।

एक आतंकी या जिहादी बनने वाला युवक दो वजहों से इनके फंदे में फंसता है… या तो वह खुद वैसे जुल्म का शिकार हुआ हो जो अफगानिस्तान, फिलिस्तीन, ईराक, सीरिया या कश्मीर में बहुतायत देखने को मिल जायेंगे। एक भारतीय होने के नाते आपको शायद कश्मीर वाला हिस्सा पचाने में मुश्किल हो लेकिन सच यही है… या फिर वह गरीबी, बेरोजगारी, भुखमरी से जूझता वो इंसान हो जिसे यूँ लड़ने की भी एक सैलरी मिलती है।

ऐसे दोनों लोग जब इनके संपर्क में आते हैं तो इन्हीं तरीकों से इनका ब्रेनवाश कर दिया जाता है कि उनकी लड़ाई ‘जिहाद’ है जिसमें मौत भी इस्लाम के नजरिये से शहादत है। मरने के बाद जन्नत तय है और काफिरों को कत्ल करना गुनाह नहीं है… जिन आयतों के मतलब यहां के आलिम कुछ और बताते हैं, उन्हीं को वे अपने अंदाज में उन युवाओं पर अप्लाई करते हैं और शुद्ध इस्लामिक नजरिये से वे ही सही हैं। नतीजा मनमाफिक आता है कि बंदा सड़कों पर अंधाधुँध गोलियां चलाने के लिये तैयार हो जाता है, बम बांध कर फटने के लिये भी तैयार हो जाता है, भीड़ पर ट्रक चढ़ा देने के लिये तैयार हो जाता है।

यह ठीक है कि आतंकवाद की बहुतेरी वजहें हो सकती हैं लेकिन जहां अत्याचार या शोषण के खिलाफ दूसरे समुदायों की लड़ाई कभी भी अपनी धार्मिक पहचान को साथ नहीं जोड़ी जाती, वहीं मुसलमानों की लड़ाई चाहे जिस भी वजह से हो, वह फौरन धर्म से जुड़ जाती है क्योंकि इसमें ग्लोबल अपील है… क्योंकि इसमें फौरन समान विचारधारा का समर्थन और सहयोग मिलने की गुंजाइश रहती है।

ऐसे या वैसे.. हालाँकि यह पूरी दुनिया को वहाबी विचारधारा में रंग देने की लड़ाई है। यह एकरूपता को मान्यता देती है और इससे बाहर जो भी है वह सब दोयम दर्जे का है। यह सोच उस विविधता भरी समावेशी संस्कृति पर सीधा प्रहार है जिसे हम देखने के आदी रहे हैं। किसी बाग की खूबसूरती तभी है जब उसमें हर वैरायटी के फूल हों… एक जैसे फूलों का बाग नहीं होता, खेती होती है। वहाबिज्म समाज के बाग को एक खेत में तब्दील कर देने वाली विचारधारा है।

अब सवाल यह है कि इससे लड़ा कैसे जाये… सिर्फ भारत के संदर्भ में बात करें तो दक्षिणपंथी विचारधारा वाले जैसी क्रिया की प्रतिक्रिया बता कर लड़ने की रणनीति बताते हैं वह तो और समस्यायें पैदा करने वाली है। गोधरा में कुछ सरफिरे मुसलमान कोच जलायेंगे तो प्रतिक्रिया में बाकी गुजरात के उग्र हिंदू दो हजार से ज्यादा उन मुसलमानों को कत्ल कर देंगे जो घटना के दोषी नहीं थे। फिर बिना वजह जो इस कत्लेआम के शिकार हुए लोगों का होता सोता बचेगा वह हथियार उठा कर ‘इंडियन मुजाहिदीन’ बना लेगा। देश के बाहर ऐसे आक्रोशित युवाओं को लपकने के लिये सौदागर पैसा और हथियार लिये तैयार बैठे हैं।

और फिर वे बम धमाके करेंगे.. आप फिर पलट के प्रतिक्रिया करोगे, फिर नये शिकार उस आक्रोश की खेती से पनपेंगे… इस तरह तो अराजकता की स्थिति ही बनेगी। ऐसे हालत में वे रोहिंग्या से तुलना करने बैठ जाते हैं। रोहिंग्या उस म्यामार से ताल्लुक रखते हैं जहां किसी की दिलचस्पी नहीं लेकिन भारत एक महाशक्ति है और इसमें बहुतेरे देशों की दिलचस्पी है… इसे अस्थिर करने के मौके बनेंगे तो बड़े-बड़े देशों की दिलचस्पी इसमें पैदा हो जायेगी। यहां हालात बिगड़े तो संभालने भी मुश्किल हो जायेंगे।

प्रतिक्रिया के नाम पर हिंसा, इस विचारधारा से लड़ने का समाधान नहीं हो सकती। इसके लिये न सिर्फ सरकारी बल्कि सामाजिक प्रयास भी करने पड़ेंगे। कुछ सरकार करे और कुछ वह लोग और संस्थायें करें जो इसकी समझ रखती हैं… लक्ष्य सिर्फ उस कट्टरता से मुक्ति हो जो किन्हीं कमजोर पलों में इंसान को हथियार उठाने की तरफ धकेल देती है। भारतीय मुस्लिमों में एक बड़ा तबका कट्टर जरूर हुआ है लेकिन अभी भी इस तथाकथित ‘जिहाद’ की तरफ उसका रुझान कतई नहीं है… और भविष्य में हो भी न, इसके लिये कोशिश होनी चाहिये।

‘जिहाद’ के तो जिक्र पर भी पाबंदी होनी चाहिये, चाहे इसकी व्याख्या ‘जिहाद अल नफस’ के रूप में कितनी ही उदार क्यों न हो। धर्म के नाम पर चलते इदारों को सरकारी नजरबंदी में लिया जाये। मदरसों को दुनियावी शिक्षा का केंद्र बनाया जाये और धार्मिक शिक्षा भी एक सीमित लेवल पर तब एलाऊ हो जब बच्चा थोड़ा मैच्योर हो जाये। बचपन से धार्मिक शिक्षाओं का प्रभाव बच्चे को भारत के बजाय सऊदी अरब के करीब धकेल देता है।

सामाजिक स्तर पर इस टाईप की मजलिसों, बैठकों, इज्तमाओं में, बजाय एकरूपता के विविधता की खूबसूरती समझाई जाये। समावेशी संस्कृति की अहमियत और स्वीकार्यता पर बल दिया जाये… और यह कोई मुश्किल काम नहीं। मुस्लिम युवाओं के लिये सिर्फ शिक्षा ही काफी नहीं बल्कि उनमें यह समझ भी विकसित करने की कोशिश करनी चाहिये कि साझी संस्कृतियों के साथ समन्वय किस तरीके से हो और उन्हें इस हद तक सहनशील होने की भी जरूरत है कि कोई भी चीज आलोचना से परे नहीं हो सकती… न खुदा, न उसके नबी या पैगम्बर और न धार्मिक किताबें।

आप इब्ने तैमिया, अब्दुल वहाब, मौलाना मौदूदी के मॉडल से हट कर इस्लाम के नाम पर भारत में पाये जाने वाले सभी फिरकों को उनकी संस्कृति, रिवाजों, परंपराओं के के साथ इस्लाम का हिस्सा स्वीकार करने और कराने पर जोर दीजिये… बजाय उन्हें काफिर, मुशरिक, मुनाफिक, खारिजी, राफजी वगैरह करार देने के, तो खुद-ब-खुद यह कट्टरता कम हो जायेगी। लोगों को यह समझ होनी जरूरी है कि वे भारतीय हैं सऊदी नहीं और उन्हें भारतीय जैसा दिखने की जरूरत है न कि अरबी जैसे दिखने की।

और यह उपाय भी भारत में ही कारगर हैं क्योंकि यहां के मुसलमान कई पैमानों पर दुनिया के दूसरे मुसलमानों से अलग हैं… बाकी दुनिया के लिये कोई रास्ता सुझाना मुश्किल है। या तो वे पाकिस्तान अफगानिस्तान की तरह आपस में लड़ेंगे मरेंगे, या सीरिया इराक की तरह अमेरिका, रशिया, ब्रिटेन, इजरायल आदि की स्वार्थ पूर्ति का शिकार हो कर खुद को तबाह करेंगे क्योंकि… असल इस्लाम वही है।

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