What next in anger? क्या आप गुस्से का रूपान्तरण कर लेते हैं?

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What next in anger? ‘गुस्सा’ एक निगेटिव इमोशन है। दुनिया का हर सभ्य देश अपने नागरिकों को क्रोध पर काबू रखना सिखाता है। वहाँ इसकी तालीम बचपन से ही दी जाती है। अगर आप Google पर जाकर Anger Management टाइप करें तो आपको हज़ारों ऐसे लेख या Video मिल जाएंगे, जिसमें यह बताया जाता है की क्रोध पर काबू किस तरह रखें।

गुस्सा स्वभाविक है लेकिन महत्वपूर्ण नहीं। What next in anger? असल बात यह है कि आप उस गुस्से में करते क्या हैं। सारा खेल रूपांतरण का है। अगर किसी ने अपने गुस्से को सही तरीके से रूपांतरित कर लिया तो वह क्रोध एक वरदान बन सकता है और अगर नहीं कर पाया तो खुद या पूरे समाज के विनाश का कारण भी बन सकता है।

इस बात को समझाने के लिए सैकड़ों उदाहरण दिये जा सकते हैं। मैं सिर्फ दो-चार आपके सामने रख रहा हूँ।

महानतम टेनिस खिलाड़ी ब्योर्न बोर्ग किशोरावस्था में इस कदर हिंसक था कि उसके स्कूल से अक्सर शिकायतें आती थीं। एक बार टेनिस मैच के दौरान उसने स्कूल में किसी बच्चे के साथ मारपीट की। टीचर ने उसकी माँ को स्कूल में बुलाया और कहा— “मैडम बुरा मत मानियेगा लेकिन यह खेल सभ्य और अच्छे खानदान वालों का है। आपके बेटे को सूट नहीं करता”। यह अपमानजनक बात ब्योर्न बोर्ग के दिमाग में इस कदर धँसी की उसने तय कर लिया कि वह कुछ भी कर ले लेकिन क्रोध का प्रदर्शन नहीं करेगा। अपने भीतर के गुस्से को उसने संकल्प में परिवर्तित कर लिया और इसके बाद का नतीजा पूरी दुनिया ने देखा। क्रोध के इस रूपांतरण ने बोर्ग को एक ऐसा खिलाड़ी बना दिया जिसका नाम सदियों तक जिंदा रहेगा।

जापानी अपने क्रोध का प्रबंधन कैसे करते हैं?

क्रोध का यह सकारात्मक रूपांतरण सिर्फ व्यक्ति नहीं बल्कि समाज और देश के लिए भी ज़रूरी होता है। जापान इसका सबसे बड़ा उदाहरण है। द्वितीय विश्वयुद्ध तक जापान एक बड़ी साम्राज्यवादी शक्ति हुआ करता था।

लेकिन हिरोशिमा व नागासाकी में परमाणु बम की तबाही के रेडिएशन से उभरे जख्म ने जापानियों को इतना बड़ा सदमा दे दिया कि उनकी सोच का स्थायी रूप से सकारात्मक रूपांतरण हो गया। पूरा देश साम्राज्यवादी विचारों को छोड़कर शांति के रास्ते पर चल पड़ा और देखते-देखते एक आर्थिक महाशक्ति बन गया। अपनी गुस्से को किस तरह सकारात्मकता के साँचे में ढाला जा सकता है, यह बात दुनिया को जापानियों से सीखनी चाहिए।

2018 के फीफा वर्ल्ड कप का एक और उदाहरण देता हूँ, प्री क्वार्टर फाइनल में बेल्जियम के खिलाफ जापान ज़बरदस्त खेल दिखा रहा था। लेकिन आखिर में उसे 3-2 से हारना पड़ा। आप भारत या किसी और देश में इस तरह के हार के बाद का दृश्य याद कीजिये। आपको स्टेडियम में टूटती कुर्सियाँ और सड़क पर जलते पुतले याद आएँगे। लेकिन वहीं जापानी दर्शकों ने अपने गुस्से को नायाब तरीके से अभिव्यक्त किया। उन्होंने मैच के बाद खाली हुए पूरे स्टेडियम की सफाई की। घंटों कचरा बीनते रहे और उसके बाद घर गये। यह होती है एक समाज और देश के सभ्य होने की निशानी।

भारत में भी लोगों को अपने गुस्से को रूपांतरित करना आता है लेकिन यह बात सिर्फ व्यक्तिगत स्तर पर कही जा सकती है, एक समाज के रूप में कतई नहीं।

इस बात को आगे दो और उदाहरणों से आपको समझाने की कोशिश करता हूँ कि अगर गुस्से का सकारात्मक रूपांतरण नहीं हुआ होता तो क्या होता।

क्या होता है जब गुस्से का प्रबंधन आपसे नहीं हो पाता?

पहला: नंद के दरबार में अपमानित होने के बाद चाणक्य ने अपनी शिखा खोल दी थी। अगर उसके भीतर सिर्फ गुस्सा होता तो वह राजा की एक मूर्ति बनाता और रोज उस पर थूकता या पेशाब करता। लेकिन चाणक्य ने अपने गुस्से को रूपांतरित किया और उसके बाद जो हुआ उसने भारत का इतिहास बदल दिया।

दूसरा: बिहार के दशरथ माँझी रास्ते में खड़े पहाड़ की वजह से अपनी पत्नी को अस्पताल नहीं ले जा सके और उसकी मौत हो गई। माँझी में इस तरह का गुस्सा था कि जैसे वह पूरी दुनिया को आग लगा दे। अगर वह क्रोध सिर्फ क्रोध रह गया होता तो माँझी आजीवन पागल होकर घूमते रहते। माँझी ने क्रोध का रूपांतरण अपने संकल्प में किया और हथौड़ा उठाकर बरसों तक पहाड़ का सीना चीरते रहे और नतीजे में आई प्रकृति पर इंसान की जीत की एक अकल्पनीय कहानी।

जैसे कि देख रहा हूँ कि देश और पूरा समाज आजकल बहुत क्रोधित है। लेकिन वह अपने क्रोध का कर क्या रहा है? यह सवाल हरेक व्यक्ति को अपने आपसे से पूछना चाहिए। हमारे स्कूल-कॉलेज के सिस्टम, हमारा समाज इस गुस्से के रूपांतरण का कोई तरीका बताने की स्थिति में नहीं है। इसका हल हमें आपको खुद ढूँढना होगा।

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